Mokshada ekadashi 2020 kab hai ? (मोक्षदा एकादशी कब है ?)

Mokshada ekadashi 2020 kab hai ? (मोक्षदा एकादशी कब है ?)

मोक्षदा एकादशी

Mokshada ekadashi Katha:

हरे कृष्णा विशेष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी( Mokshada ekadashi 2020) कहा जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के श्री मुख से पवित्र श्रीमद्भगवद्गीता का जन्म हुआ था। सनातन संस्कृति में श्रीमद्भगवद्गीता न केवल पूजा अपितु अनुकरणीय भी है या विश्व का इकलौता ऐसा ग्रंथ है जिस की जयंती मनाई जाती है और जिसे हम गीता जयंती कहते हैं, समस्त वैदिक ग्रंथों का सार है। विद्युत का प्रवचन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। गीता  में कहा गया है कि जो भगवद्गीता को निष्ठा तथा गंभीरता के। सात पड़ता है उसके सारे पूर्व दुष्कर्म के फलों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्रमुख सदा एकादशी का ही वह पावन दिन है। जब इस धरा पर भगवत गीता का उद्धरण हुआ जो कोई मनुष्य इस पवित्र ग्रंथ में बताए गए सिद्धांतों को ग्रहण करते हैं। वे अपना जीवन पूर्ण बनाते हैं और जीवन की सारी समस्याओं का स्थाई हल की बातें हैं। आज हम इसी अति पुण्य दायिनी मोक्षदा एकादशी के विषय में चर्चा करेंगे। विष्णु पुराण के अनुसार मोक्षदा एकादशी ( Mokshada ekadashi 2020) का व्रत वरिष्ठ नेता एकादशी का उपवास रखने के बराबर है। इस एकादशी का पूर्ण पितरों को अर्पण करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। ब्रह्मांड पुराण में मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाले मोक्षदा एकादशी का महत्व भगवान श्री कृष्ण महाराज युधिष्ठिर को बताते हैं। एक बार महाराज युधिष्ठिर ने भगवान से कहा। हे भगवान आप तीनों लोकों के स्वामी सब को सुख देने वाले और जगत के प्रति  हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूं।

सदैव आप सब के हितैषी हैं। अतः मेरे इस संशय को दूर कर मुझे बताइए कि मार्कशीट एकादशी का क्या नाम है। उस दिन कौन से देवता का पूजन किया जाता है और उसकी विधि क्या है। कृपया मुझे आप यह सब बताएं तब वत्सल भगवान श्री कृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज तुमने बड़ा है, उत्तम प्रश्न किया है। इसके सामने से तुम्हारा यह संसार में खेलेगा। मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी अनेक पापों को नष्ट करने वाली है और इसका नाम मोक्षदा एकादशी ( Mokshada ekadashi 2020) है। दामोदर भगवान की धूप, दीप, नैवेद्य, तुलसी मंत्री आदि से भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए तथा पुराणों में इस प्रकार है। इसे ध्यान पूर्वक सुने प्राचीन समय में वैष्णव निवासी रमणीय चंपक। नगर में बैठा नाथ महाराज राज्य करते थे। उनके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहा करते थे। राजा अपनी प्रजा का पुत्र व्रत पालन भी किया करता था। एक रात्रि राजा को स्वप्न में अपने पिता को नरक की यातनाएं करने का दृश्य दिखा। एक प्रकार का सपना देख कर आजा पड़ा ही व्याकुल हो गया। मैं बेचैनी से सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगा। सुबह होते ही उसने ब्राह्मणों को बुलाकर उनके समक्ष अपने सपने की बात बताई।

उसने कहा है ब्राह्मणों रात्रि को सपने में मैंने अपने पिता को नरक की बहुत यातनाएं भुगते देखा है और उन्होंने मुझसे कहा है कि हे पुत्र में घोर नरक भोग रहा हूं। मेरी यहां से मुक्ति कराओ। जब से मैंने उनके हैं। बचन सुनि है तब से मुझे चैन नहीं। मुझे अब राज्य सुख, हाथी, घोड़े, धन, स्त्री, पुत्र आदि कुछ भी सुखदायक प्रतीत नहीं हो रहे। अब मैं क्या करूं? कहां जाऊं इस दुख के कारण में। शरीर तक रहा है इसलिए कृपया आप लोग मुझे किसी प्रकार का तप दान व्रत आदि बताएं जिससे मेरे पिता को मुक्ति प्राप्त हो। यदि मैंने अपने पिता को नर्क की यातना से मुक्त कराने के प्रयास नहीं किए तो मेरा यह जीवन निरर्थक है जिसके पिता नरक की यातनाएं भोग रहे हो। उस व्यक्ति को इस धरती पर सुख भोगने का कोई अधिकार नहीं है। ब्राह्मण देवों मुझे शीघ्र ही इसका कोई उपाय बताने की कृपा करें। राजा के आंतरिक तो की पीड़ा को सुनकर ब्राह्मणों ने आपस में विचार-विमर्श किया। फिर एकमत होकर बोले कि हे राजन, वर्तमान, भूत और भविष्य के ज्ञाता पर्वत नाम के एक मुनि यहां पर रहते हैं जो यहां से अधिक दूर नहीं।

आप अपनी है। बता उनसे जाकर कहीं मैं अवश्य ही इसका कोई सरल उपाय आपको बता देंगे। तब ब्राह्मणों की बात मान राजा पर्वत मुनि के आश्रम पर गए आश्रम। अनेक शांत चित्त योगी और मुनि तपस्या कर रहे थे। चारों वेदों के ज्ञाता पर्वत मिनी दूसरे ब्रह्मा के समान बैठे जान पढ़ रहे थे। राजा ने उन्हें साक्षात दंडवत प्रणाम किया तथा अपना परिचय दिया। पर्वत मनी ने राजा से कुशलक्षेम पूछी। तब राजा ने बताया है। मुनि बस आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है किंतु मेरे समक्ष अकस्मात ही एक ऐसी समस्या आ खड़ी हुई है जिससे मेरा ह्रदय बड़ा ही अशांत हो रहा है। राजा ने मुनि को व्यथित हृदय से रात में देखे गए सपने की पूरी बात बताएं और फिर दोपहर में बोला है। महर्षि अब आप कृपा कर मेरा मार्गदर्शन करें। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए। कैसे मैं अपने पिता को नर्क की यातना से मुक्ति दिलाने की बात पर्वत मुनि ने गंभीरता पूर्वक सुने। फिर नेट बंद कर भूत और भविष्य पर विचार करने लगे। कुत्ते गंभीरतापूर्वक चिंतन करने के बाद उन्होंने कहा, हे राजा, मैंने अपने योग बल के द्वारा तुम्हारे पिता के सभी को कर्मों का ज्ञान प्राप्त कर लिया है। उन्होंने पूर्व जन्म में अपनी पत्नियों में भेदभाव किया था।

उसी पाप कर्म के फल से तुम्हारे पिता नरक में गए हैं। यह जानकर रखा नचनिया चना भरे स्वर में कहा है। रिसीवर मेरे पिता के उद्धार का आखिरी उपाय बताने की कृपा करें। किस प्रकार स्पेस पार्क से मुक्त होंगे। इस पर पर्वत मिनी बोले, हे राजन् मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसे मोक्षदा एकादशी कहते हैं। यह मोक्ष प्रदान करने वाली है। आप इस मोक्षदा एकादशी का व्रत करें और उस व्रत के पुण्य को संकल्प करके अपने पिता को अर्पित कर दें। एकादशी के प्रभाव से अवश्य ही आपके पिता की मुक्ति होगी। के वचनों को सुनकर राजा अपने राज्य को लौट आए और परिवार सहित मोक्षदा एकादशी( Mokshada ekadashi 2020) का व्रत किया। इस व्रत के पुण्य को राजा ने अपने पिता को अर्पित कर दिया जिससे इस पुण्य के प्रभाव से राजा के पिता को सहज ही मुक्ति मिल गई। सबको प्रस्थान करते हुए राजा के पिता ने कहा, हे पुत्र 13 कल्याण हो। इतना कहकर राजा के पिता ने सबको प्रस्थान किया है। पांडु पुत्र जो मनुष्य मार्च माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का उपवास करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। अंत में स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं।

मोक्षदा एकादशी

 

Moksadha ekadashi varat

 उपवास से उत्तम और मोक्ष प्रदान करने वाला कोई भी दूसरा व्रत नहीं है। मोक्ष प्रदान करने वाली चिंतामणि के समान है जिससे उपवास करने वालों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। राजन प्रत्येक मनुष्य की प्रबल इच्छा होती है कि वह मोक्ष प्राप्त करें। की एक मुख्य की इच्छा करने वालों के लिए मोक्षदा एकादशी का उपवास अति महत्वपूर्ण है। भगवान श्री हरि विष्णु के निमित्त उपवास पूर्ण निष्ठा व श्रद्धा से करना चाहिए। हम तब भी भगवान श्री कृष्ण के भक्ति में अत्यंत सहायक है। मैं इसे अधिक से अधिक नाम संकीर्तन करें। जब करें व विशेष दया भगवत गीता का अध्ययन करें तथा अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को कम करते हुए अपना संपूर्ण ध्यान भगवान श्री कृष्ण के श्री चरणों में रामायण कथा एकादशी के पावन अवसर पर इस फोन के सभी मंदिरों में भगवत गीता, यथारूप तथा शास्त्रों की हिस्सा रूप अनेक छोटी-बड़ी किताबों का वितरण किया जाता है ताकि प्राणी मात्र तक भगवान का यह दिव्य संदेश पहुंच सके। आप सभी इस पुनीत। सारे में सहभागी बने पुस्तकों को खरीद कर उनका अध्ययन कर उनका वितरण कर अपना यह मनुष्य जीवन सफल बनाएं।

धन्यवाद हरे कृष्ण।

{मेरे ब्लॉग में अब तक बने रहने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद फिर मिलेंगे किसी नए ब्लॉग के साथ}

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